बुराई का भयानक अंजाम

 एक दिन मैं खाना बना रही थी कि दरवाजे पर दस्तक हुई। दरवाजा खोलने पर मेरे पति हमीद मेरे सामने खड़े थे, साथ में एक और व्यक्ति भी था। मुझे देखकर वह दरवाजे की ओट में हो गया। तब ही मेरे पति बोले, "आज दफ्तर से जल्दी आना हो गया। अचानक मेहमान आ गया, क्या खाना तैयार है?"

"जी, तैयार है," यह कहकर मैं बावर्ची खाने में चली गई और हमीद अपने दोस्त को लेकर बैठक में जा बैठे।

बुराई का भयानक अंजाम

बुराई का भयानक अंजाम

उन्होंने खाना खाकर मेहमान को बैठक में पड़ी चारपाई पर आराम करने को कहा और मुझे उस दोस्त के बारे में बताया कि फिरोज मेरे बचपन का दोस्त है, आजकल बुरे हालात का शिकार है। अब मेरे पास आया है। यहाँ न तो उसके पास रहने का ठिकाना है और न ही रोजगार में परेशान हूँ कि उसे कहाँ ठहराऊँ? बैठक में ठहरा लीजिए, मैंने पति को परेशान देखकर कहा।


वह भी एक तरह से रजामंदी लेना चाहते थे क्योंकि मेहमान की खाने का इंतजाम तो मुझे ही करना था। हमीद पर सुकून हो गए  और बोले कि मैंने उसे तसल्ली दी है कि जब तक तुम्हारे रोजगार का बंदोबस्त नहीं होता, तब तक कहीं जाने की जरूरत नहीं है। मेरे पास रह जाओ। रहने का ठिकाना, रोजगार सब अल्लाह की मेहरबानी से हो जाएगा।

हमीद ने घर की बैठक फिरोज के लिए खाली कर दी और मैं सुबह-शाम खाना पकाकर भेजने लगी। दो महीने यह शख्स हमारे घर मेहमान रहा। कुछ उसे बेफिक्री और सुकून मयस्सर आया तो दिलजमई से नौकरी की तलाश शुरू कर दी। हमीद भी अपने जानने वालों से कहते थे कि मेरे दोस्त फिरोज को मुलाजमत की जरूरत है, कोई सिलसिला बने तो मदद करो।

अंत में उनकी कोशिशें रंग लाईं और फिरोज को एक महकमे में उपयुक्त नौकरी मिल गई। माली मुहताजी दूर हो गई तो वह रहने का ठिकाना ढूंढने लगा। तब ही हमीद ने अपनी मकान मालिक से तजकिरा किया। हमारे बराबर वाला मकान खाली पड़ा था।

उस औरत ने यह घर फिरोज को मुनासिब किराए पर दे दिया। यूं अब वह हमारा पड़ोसी बन गया। उसके पड़ोस में खुद मकान मालिक की रिहाइश थी। सब कुछ तो हो गया, लेकिन अब एक समस्या उसे यह दरपेश थी कि उसे खाना बनाकर देने वाला कोई नहीं था।

मैं भी चाहती थी कि वह अपना कोई इंतजाम कर ले। वह भी तकलीफ महसूस करने लगा था। कहता था कि भाभी ने बहुत है तकलीफ उठाई है, मजीद उन्हें जेहमत नहीं देना है चाहता।

फ़ीरोज़ की शादी 

आखिर हमीद ने मशवरा दिया। कहा, "फिरोज मियां, शादी कर लो। कब तक कोई तुम्हें खाना खिलाएगा और कब तक होटल का मुज़र सेहत खाना खा पाओगे?" इस पर वह हंस दिया, बोला, "हमीद यार, मेरा कौन है, जो मेरी शादी कराएगा? भाई, यह तो - वही बात हुई न, न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी।"

इन्हीं दिनों मेरी छोटी बहन इलाज की खातिर गांव से हमारे घर आई हुई थी। वह कुछ अरसे से बीमार रहती थी। हमीद ने मुझसे जिक्र किया कि तुम कहो तो मैं फिरोज से बात करूं? पहले अपनी मां से सलाह ले लो। वह मान जाएं तो रोशन की शादी फिरोज से हो सकती है। लेकिन मुझे तो नहीं पता कि आपका दोस्त कैसा आदमी है? अरे भाई, निहायत शरीफ आदमी है।

हम बचपन से साथ खेले हैं। आगे पीछे कोई नहीं है। दो महीने में तुमने भी इसे जांच परख लिया होगा। कोई बुरी आदत इसमें नहीं है। ठीक है, मैं अम्मी और बहन से बात करती हूँ, तुम बाद में दोस्त से बात करना।

मैंने माँ से बात की, वो बोलीं, "कौन माँ नहीं चाहती कि उसकी लड़की समय पर ब्याही न जाए। तुम्हें पता है कि दो तीन महीने से तुम्हारी बहन कुछ बीमार रहने लगी है, तब्ही यहाँ लाई हूँ। पहले यह ठीक हो जाए। हाँ, माँ इलाज होगा तो ठीक हो जाएगी। आप ने आखिर इसे ब्याहना तो है। फिर तुम और हमीद खुद सोच समझकर रिश्ता तय कर लो। हमारे माली हालात का भी तुम लोगों को इल्म है। इसकी आप फिक्र न करें। आप रजामंद हैं तो मैं हमीद से बात कर लेती हूँ।"

यूँ मैंने हमीद से और उन्होंने फिरोज से इसके रिश्ते का तजकिरा किया। जवाब में फिरोज चुप रहा। इस चुप का क्या मतलब है, यार मेरी साली देखी भाली है। अपने घर की लड़की है। अगर तुम शादी करना चाहते हो तो मुंडी हिला दो। तेरा घर आबाद हो जाएगा और खाने पीने की समस्याओं से भी निजात मिल जाएगी।

फिरोज ने कहा, "जो तुम बेहतर समझो, मुझे मंजूर है। अब तुम ही मेरे भाई भी हो और दोस्त भी।" बात इतनी जल्दी बन गई कि मुझे गुमान भी नहीं था कि कल तक जो मेहमान था, अब हमारे घर का एक सदस्य बनने जा रहा था।

फिरोज ने हमीद से यह भी कहा था कि मेरी माली हालत तुमसे पोशीदा नहीं है, अभी मेरी नौकरी लगी है। इसकी तुम फिक्र मत करो। वह सब इंतजाम हो जाएगा। तुम रजामंद हो तो फिर मैं सास और साली से बात कर लेता हूँ। यूँ फिरोज की शादी मेरी बहन रोशन से हो गई। जेवर कपड़ा सब मैंने अपनी तरफ से बहन को दिया क्योंकि फिरोज के पास जेवर और कपड़े के लिए रुपया नहीं था। लड़के की तरफ से शादी का खर्च भी हमने किया।

मुझे यकीन था कि रोशन शादी के बाद खुशी मिलने से ठीक हो जाएगी क्योंकि उसकी शादी की उम्र निकली जा रही थी और मेरे माता पिता के माली हालात ठीक न होने के कारण कोई अच्छा रिश्ता भी नहीं मिल रहा था। इस स्थिति में अक्सर लड़कियाँ नाउम्मीद होकर बीमार पड़ जाती हैं और उनकी बीमारी किसी के समझ में नहीं आती।

हुआ भी यही कि शादी के बाद रोशन की रंगत सुर्ख होने लगी और वह तंदुरुस्त दिखाई देने लगी। हमीद ने भी यही सोचा था कि उनकी ज़रा सी कुर्बानी से, यानी शादी का खर्च उठाने पर, उनके दोस्त का घर बस जाएगा और ससुराली भी खुश हो जाएंगे कि उनकी लड़की को अच्छा वर मिला है।

दोनों का घर बन गया। फिरोज और रोशन खुश रहने लगे और अपनी दुनिया में मगन हो गए। हम भी खुश थे कि चलो, अच्छा हुआ, यह बेल मुंड़े चढ़ी। हमीद ससुरालियों में सुर्खरू थे कि रोशन शादी के बाद खुश है।

साल बाद उसने बच्ची को जन्म दिया, जिसका नाम उसने हूरिया रखा। वह बहुत प्यारी सूरत वाली, गोल-मटोल भी थी। हमारे घर में कोई बच्चा नहीं था। मैं उसे घर ले आती, घंटों अपने पास रखती। मुझे अपनी भान्जी बहुत प्यारी लगती थी। अब तो वह हमेशा मेरे पास ही रहती थी। वह मुझसे इतनी मानूस हो  गई थी कि जब रात को सो जाती, तब माँ उसे उठाकर ले जाती। अब वह दो साल की हो गई थी और मेरी इतनी आदी हो गई थी कि एक मिनट भी मेरे बिना नहीं रहती।

साली की मौत 

खुदा की करनी कि मेरी बहन फिर से बीमार रहने लगी और उसकी बीमारी इतनी बढ़ी कि वह लागर हो गई। डॉक्टरों ने कैंसर का पता लगाया और वह छह महीने बाद चल बसी। जवान मौत पर हर आंख अश्कबार थी, लेकिन फिरोज का तो घर उजड़ गया था और हूरिया बेसहारा हो गई।

तब फिरोज ने उसे पूरी तरह से मेरे हवाले कर दिया कि अब यह आपकी ही बेटी है, आपको इसकी परवरिश करनी है। बहन की वफात और भांजी के बिना मां हो जाने पर मैं बहुत रोई करती थी। हमीद भी गमजदा थे कि उनके प्यारे दोस्त का घर उजड़ गया था।

इस अरसे में यह किसी को पता नहीं चला कि हम आपस में रिश्तेदार हैं या गैर। रोशन ने अपनी वफात से दो दिन पहले फिरोज से वादा लिया था कि मेरी बेटी को बाजी को दे देना और खुद जहां मर्जी हो, शादी कर लेना।

साल बाद मैंने और हमीद ने फिरोज को मशवरा दिया कि वह दोबारा शादी कर ले। बच्ची तो हमारे पास है, लेकिन उसने इनकार कर दिया।

फ़ीरोज़ का मालकिन के साथ चक्कर 

 उसका कहना था कि अब मैं और शादी नहीं करूंगा, बस ऐसे ही जिंदगी गुजार लूंगा। कुछ अरसे बाद पता चला कि वह घर की मालकिन सरवरी बेगम के घर भी आता जाता है। उसका शौहर सऊदी अरब कमाने गया हुआ था। वह घर में बच्चों के साथ अकेली रहती थी। हमने इन दोनों के बारे में चेह मेगोईयां सुनीं तो हमीद ने फिरोज से पूछा। वह बरहम हो गया, कहने लगा, "ऐसी कोई बात नहीं है। लोग तो यूं ही बात का बतंगड़ बना लेते हैं। इस बेचारी का मर्द परदेस में है। उसे बाहर के काम करवाने होते हैं तो मुझे कहलवा देती है, मैं कर देता हूं। बस इतनी सी बात है जिस पर लोग हमें बदनाम कर रहे हैं।"

हमीद यह सुनकर खामोश हो गए, हलांकि लोगों ने यह तक कहा था कि सरवरी  बेगम रात को भी फिरोज के घर आती जाती है। महल्ले और पास पड़ोस के लोगों ने देखा था। तभी  सर्दियां आईं। फिरोज ने मुझसे कहा, "बाजी, मेरी रजाई धुलवा कर भर दीजिए। मुझे रात को सर्दी महसूस होने लगी है।" मैंने कहा, "भैया! मकान और पेटी की चाबियां दे जाना, मैं जा कर रजाई निकाल लूंगी।" उसने मुझे चाबियां दे दीं। मैं उसी रोज गई और बिस्तरों वाली पेटी में से रजाई निकालने लगी। जैसे ही मैंने एक रजाई बाहर निकाली, उसके अंदर से कई खत भी निकल कर फर्श पर गिर पड़े। मैं यह देखकर घबरा गई। ये सरवरी बेगम के मोहब्बत नामे थे जो फिरोज के नाम थे।

एक शादीशुदा औरत और दो बच्चों की माँ,

हलाल की कमाई

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जिसका पति उसे सुख पंहुचाने के लिए परदेस में था, उसके एक गैर आदमी से इस तरह की जान-पहचान देखकर मुझे पड़ोसन से बहुत नफरत महसूस हुई। साथ ही, अपने बहनोई के अच्छे चरित्र के बारे में जो राय थी, वह जमीन बोस होकर गिर पड़ी। मैं तो फिरोज को निहायत नेक चलन और  बाकिरदार आदमी समझती थी। इन खतों  में हमारे घर की बातें भी थीं। मैं ये सारे खत उठा कर घर ले आई। जब फिरोज को पता चला कि खत  में उठा लाई हूँ, तो वह बहुत नाराज हुआ और हमसे झगड़ पड़ा और अपना जेवर जो हमारे पास था, मांगा। जो उसकी रकम हमारे पास अमानत रखी थी, वह भी हमसे ले ली। 

यही नहीं, अपनी बच्ची भी ले गया। हमसे बोलचाल बंद कर दी और बच्ची को सरवरी बेगम के हवाले कर दिया। मेरे लिए यह सब कुछ बहुत तकलीफदेह था। बच्ची आँखों के सामने साथ वाले घर में रोती रहती और हम उसे अपने पास नहीं ला सकते थे। वह मुझे अम्मी कहकर बुलाती थी। वह अम्मी, अम्मी की दुहाइयाँ देती रहती और मैं दीवार से उधर उसकी पुकारें सुनकर रोती और तड़पती रहती। हमीद से मेरी यह हालत नहीं देखी जाती थी। आखिर उन्होंने यह फैसला कर लिया कि फिरोज से लड़ने के बजाय घर ही बदल लिया जाए, ताकि न बच्ची की आवाज हमारे कानों तक आएगी और न ही झगड़ा होगा।

हमारा सिर्फ यही क़सूर था कि हमने फिरोज को समझाया था कि वह एक ग़ैर औरत से गलत मरासिम न रखे, क्योंकि यह बुरी बात है और बुरी बातों का अन्त बुरा ही होता है। बस हमारी यही नसीहत उसे हमसे बहुत नाराज़ी का ज़रिया बन गई। जिस दिन हम घर छोड़कर जा रहे थे, सारा मोहल्ला इकट्ठा हो गया। सबने पूछा, क्या बात है? क्यों तुम घर बदल रहे हो? इतने बरसों का साथ है, जाने अब कैसे लोग किराएदार आएं। हमीद उन्हें क्या वजह बताते? यही कहा कि मजबूरी है, इसलिए जा रहे हैं। वे कुछ सामान लेकर चले गए। 

गली में तूफान बरपा कर दिया 

बाकी सामान और मुझे उन्होंने दूसरे चक्कर में ले जाना था। जब वापस आए तो देखा कि मेरा अच्छा-खासा झगड़ा सरवरी बेगम से हो चुका है। जब किसी मामले में औरतें बोल पड़ती हैं, तो बात जल्दी खत्म नहीं होती। मोहल्ले की औरतें जमा हो गईं। सबने कहा, दस साल तुम लोग रहे, आपस में कोई झगड़ा नहीं हुआ। आखिर क्यों अब घर छोड़कर जा रहे थे और अब झगड़ा भी हो गया। तब मैं फट पड़ी कि यह औरत अपने मोहब्बतनामे मांग रही है, जो उसने मेरे भैनोई फिरोज को लिखे हैं, लेकिन मैं नहीं दूंगी, क्योंकि इन खतों में हमारी बुराइयां भी लिखी हुई हैं। अगर दूंगी तो फिरोज को दूंगी, क्योंकि मैंने उसकी बिस्तरों वाली पेटी से उठाए थे। यह मांगने वाली कौन होती है? अगर आपको यकीन नहीं आता तो सारे खत आपको भी दिखा सकती हूं।

मेरे यह कहने से तो तूफान ही आ गया और बात मारपीट तक पहुंच गई। जब हमीद पहुंचे तो हमारी मारपीट और हाथापाई हो रही थी। हमीद ने मुझसे कहा, "इस्मा! मुझे तुम्हारी नादानी पर बहुत अफसोस है। जब मैंने तुमसे कहा था कि झगड़ा न करना और खतों की कोई बात मुंह से मत निकालना, तो यह बात तुम्हारे मुंह से क्यों निकल गई?"

मुझे तो अपनी नहीं भांजी से जुदाई का बहुत गम था, जो उस औरत के कब्जे में थी जो उसकी कुछ भी नहीं लगती थी। वह बच्ची को मेरे पास आने नहीं देती थी, बस इसी गुस्से के रिएक्शन ने मुझसे ऐसी बात कहलवा दी। हम नए मकान में चले गए, लेकिन मैं यहां आकर बिलकुल खुश नहीं थी। बहुत उदास और बुझी-बुझी रहती थी। हूरिया की जुदाई और बहन की मौत ने मुझ पर बुरा असर डाला था। मैं अपनी मरहूमा बहन की निशानी से बहुत मोहब्बत करती थी।कुछ महीने तो मैं इस गम में घुलती रही, फिर आखिर काबू नहीं कर सकी तभी एक दिन अपने पुराने मोहल्ले चली गई।

जूं हीं रिक्शा पुराने घर के करीब रुका, हूरिया ने मुझे पहचान लिया और अम्मी कहती दौड़ती हुई आकर रिक्शे में चढ़कर बैठ गई। उसकी वाल्हानी मोहब्बत से बेकाबू होकर मुझे जाने क्या सुझी कि दिल पर काबू नहीं रहा मैं आना-फानना उसी रिक्शे में अपने साथ घर ले आई। जब हमीद घर लौटे, तो यह वाकिया हो चुका था। उन्होंने मुझे बुरा-भला कहा और बोले, "तुमने यह क्या हरकत की है? अब तुम्हारा भैनोई हम पर अपनी बेटी के अगवा का केस दर्ज कर देगा।"

मैंने बच्ची को प्यार में उठाया था, लेकिन फिरोज भाग-दौड़ में लग गया क्योंकि आस-पड़ोस की औरतें भी देख रही थीं कि मैं फिरोज की बेटी को रिक्शे में बैठाकर ले जा रही थी। इसलिए मेरे भैनोई ने हम पर बच्ची के अपहरण का मामला दर्ज करा दिया। तब हमीद भागकर उसके पास गए कि ऐसा नहीं करो - मेरी पत्नी प्यार में मजबूर होकर भांजी को थोड़े समय के लिए ले आई थी। मैं खुद अभी उसे वापस पहुंचाने आ रहा था। आप परेशान न हों और न ही बात थाने तक ले जाएं, लेकिन वह बोला कि थाने चलो, बात वहीं होगी। बड़ी मुश्किल से हमीद ने उसे समझाया कि आगे से ऐसा नहीं होगा। कल सुबह ही हम आपकी बच्ची को आपके हवाले कर देंगे। उसने कहा, ठीक है, आप बच्ची को एक-दो दिन रख लो ताकि मैं मामला खत्म कराऊं। दो दिन बीत गए थे। 

औरत के शौहर ने रंगे हाथों पकड़ा फ़ीरोज़ को 

दो पहर के बाद जब हमीद ऑफिस से आए थे कि दरवाजे पर दस्तक हुई। उन्होंने दरवाजा खोला और देखा कि फिरोज बहुत घबराया हुआ खड़ा है। शरीर पर कपड़े भी मौजूं नहीं हैं, न ही पैरों में चप्पल है। हमीद उसकी हालत पर हैरान रह गए। 

पूछा, क्या हुआ? खैरियत तो है? खैरियत नहीं है। फिरोज ने जवाब दिया, आप ठीक कहते थे कि बुरे काम का अन्त बुरा होता है। मैं फंस गया हूं, मुझे अब सिर्फ आप ही बचा सकते हो। हमीद उसे अंदर ले आए। पानी पिलाया, अपने कपड़े दिए और तस्सली भी कि जो कुछ हुआ, उस से भूल कर  मैं आपकी हर तरह से मदद करूंगा। बताओ तो सही, बात क्या है? फिरोज ने बताया कि आज दो पहर में सरवरी  के साथ अपने घर में मौजूद था कि अचानक बिना इत्तला के उसका शौहर घर में आ गया। मैंने दरवाजे की कुंडी सही तरह से नहीं लगाई थी। 

वह आँगन से होता हुआ कमरे में हमारे सरों पर आ पहुंचा। हम तो बेखौफ बैठे थे कि उसका शौहर बाहर देश में होता था। अब यह अचानक आफत नाज़िल हुई तो हमारे दिमाग सुन रह गए। दरअसल वह बिना इत्तला के आया था। घर पहुंचा तो उसके बच्चों ने बताया कि मां साथ वाले मकान में अंकल फिरोज से मिलने गई है। बच्चों को खबर थी कि वह अक्सर दो पहर मेरे घर आती थी और उनसे कहती थी कि घर का ध्यान रखना, बाहर मत निकलना। जब उस शख्स ने अपनी पत्नी को मेरे बहुत करीब देखा तो जल उठा ।

मैं तो वहां से किसी तरह बच निकलने में कामयाब हो गया लेकिन उसने पता नहीं अपनी बीवी को कितना मारा कि मोहल्ले वाले इकट्ठे हो गए थे। मैं तो उस जगह जाने से डरता हूं मेरे मकान का दरवाजा खुला पड़ा है। वहां सब सामान, जेवरात, नकदी सूटकेस में मौजूद है। तुम ही किसी तरह उस मोहल्ले में जाकर पता करो कि क्या हुआ है? मैं तो अब वहां नहीं जा सकता। लोग मुझे मारेंगे, मोहल्ले भर में बदनामी भी होगी।

हमीद ने उसी समय मोटरसाइकिल निकाली और पुराने मोहल्ले चले गए। वहां जाकर स्थिति देखी। फिरोज के मकान की कुंडी बजाई, वहां कोई होता तो बोलता। इतने में मोहल्ले के तीन-चार आदमी इकट्ठे हो गए। शायद वे ताक में थे कि वह आए तो उससे दो-दो हाथ करें।

हमीद ने उनसे कहा, "आपको पता है कि फिरोज का मुझसे झगड़ा हो गया था, इसी वजह से मैं यह घर छोड़कर चला गया था। आज किसी काम से इधर से गुजर रहा था, काम यह था कि फिरोज ने अपनी बच्ची के अपहरण का परचा हम मियां-बीवी पर दर्ज करा दिया था जब कि मेरी बीवी अपनी भांजी को प्यार की वजह से अपने साथ ले गई थी। इस सिलसिले में फिरोज से मिलना चाहता था,

बदनामी की रात

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मगर यहां तो स्थिति कुछ और मालूम होती है।"

मोहल्ले वालों ने फिरोज को खूब गालियां दीं कि वह तुम्हारा हमज़ल्फ था, अब तुम ही उसका सामान यहां से उठाकर ले जाओ, वरना हम उसके सामान को आग लगा देंगे।

हम किसी सूरत उसे दोबारा इधर देखना नहीं चाहते, दरवाजे पर खून खराबा होगा। ग़ज़ब खुदा का ! एक शरीफ आदमी की ग़ैर मौजूदगी में उसके घर की नकब लगा रहा था। सरवरी का शौहर तो बीवी को क़त्ल कर देता, अगर हमने दखल देकर उस औरत को नहीं बचाया होता। वह इतनी ज़ख्मी थी कि उसे अस्पताल ले गए हैं और उसका मर्द थाने बैठा है।

हमने गवाही दी कि मियां-बीवी का किसी मामूली घरेलू बात पर झगड़ा था, बात रफा-दफा कर दी। हमने फिरोज का नाम नहीं आने दिया, वरना हमारा मोहल्लेदार जो बेचारा इतने अरसे बाद देश से बाहर से बच्चों के लिए खुशियां कमाकर लाया था, उसके बच्चे बाप की शफ़क़त से महरूम हो जाते। आप इस समय उसका मकान खाली कर दें और सामान ले जाएं, पुलिस के चक्कर में पड़ गए तो और ज्यादा यहां मुसीबत खड़ी हो जाएगी।

हमीद ने ही फिरोज को यह मकान किराए पर दिलवाया था और सब जानते थे कि यह दोनों हमज़ल्फ ही हैं। वह मेरे शौहर पर भरोसा करते थे, उनकी इज्ज़त करते थे। हम बहुत अरसे से यहां रहते थे। हमीद की साख अच्छी थी तो मोहल्ले वालों ने उन पर भरोसा किया। मेरे शौहर ने उन लोगों से वादा किया कि यह काम हो जाएगा, फिक्र न करें। फिलहाल मैं सामान ले जाकर अपने घर अमानत रख लेता हूं और फिरोज भी इधर अब नहीं आएंगे।

अच्छा हुआ आप लोगों ने पुलिस में ऐसा बयान न देकर हमारी इज्ज़त रख ली, वरना तो सच है कि गेहूं के साथ घुन भी पिस जाता है। इस तरह कुछ मेज़बान मोहल्लेदारों की मौजूदगी में हमीद ने फिरोज का सामान उठाया और रशीद भी लिखकर दी ताकि मामला रफा-दफा हो जाए। इसके बाद वह भी इस मोहल्ले में नहीं गए और फिरोज ने तो खुद को काफी अरसे रूपोश ही रखा। खबर नहीं सरवरी को उसके शौहर ने माफ कर दिया, या तलाक थमा दी लेकिन इस वाकये से फिरोज के तो मिजाज ठिकाने आ गए। उसने बुराई से तौबा कर ली और अपनी बेटी को हमारे सुपुर्द कर दिया। मुझसे कहा कि बाजी! हुरिया को आप ही रखो, उसे अपनी ही बेटी समझो। तब मैंने भी सुकून का सांस लिया और अपनी मरहूम  बहन की बेटी को हमेशा गले से लगाकर रखा।